आकांक्षा मिश्रा पत्रकारिता विभाग एवं जनसंचार विभाग कानपुर यूनिवर्सिटी
आरक्षण खत्म होना चाहिए यही देश के हर युवा की आवाज हैं।
कानपुर–
आरक्षण क्या है? पहले इसके बारे में जानना अति-आवश्यक है तभी हम इसकी मूल धारणा को जान पाएंगे। अलग अलग लोगो में अलग अलग मत है कोई कहता है होना चाहिए कोई कहता नहीं होना चाहिए। कोई कहता है यह संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है। कोई कहता है जो बाबा साहेब लिख कर गए आरक्षण के बारे में उसके खिलाफ है।
सबसे मूल बात जो है आरक्षण उसके बारे में लोग बात तो करना चाहते है लेकिन क्या वे इसके व्यापक स्तर को बहस का मुद्दा बनाना चाहते है शायद नहीं, क्योंकि किसी से भी बहस कर ले उनके आरक्षण का मुख्य मुद्दा हमेशा जातिगत आरक्षण के साथ चिपकी हुई नज़र आती है। 1932 में जब गोलमेज सम्मलेन में इस बात पर सहमति बनी की आरक्षण होना चाहिए तो आखिर इसका आधार क्या होना चाहिए तो वहाँ पर यह तय हुआ की समाज में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से लोग समाज के मुख्य धारा से वंचित रह गए है उनकी सूची तैयार की जाय और उस सूची के आधार पर समाज में इन लोगो के लिए कुछ प्रावधान रखा जाय ताकि इनको समाज की मुख्य धारा में शामिल किया जा सके और बाद में इसी को आधार बनाकर बाद में संविधान में प्रावधान रखा गया और इस सूची को संविधान में नाम दिया गया अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जनजाति बाद में इसी सूची में एक नया सूची शामिल किया गया जिसको नाम दिया गया अत्यंत पिछड़ा वर्ग। आरक्षण पेट भरने का साधन नहीं, इसका जो मूल अर्थ है वह है प्रतिनिधित्व। आरक्षण के द्वारा ऐसे समाज को प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया गया जो शुरू से समाज के अंदर दबे कुचले रहे है। इस प्रतिनिधित्वता को नाम दिया गया। देश का विकास करना है तो उसके लिए सबसे जरूरी हैं कि देश से आरक्षण खत्म हो क्योंकि देश का हर एक युवा मेहनत करता है लेकिन जब प्रतियोगी परीक्षा में उन बच्चों को अपनी मेहनत का फल न मिलकर निराशा ही हाँथ लगती हैं। तो ऐसे में उनकी उम्मीदे टूट जाती हैं। सबको एक समान एक वर्ग में रखा जाए किसी को कम नम्बर य ज्यादा नम्बर नहीं बल्कि मेरिट के अनुसार भर्ती हो। आरक्षण की वजह से देश मे बेरोजगारी फैली है देश तरक्की नहीं कर पा रहा है।लोग सामाजिक आरक्षण को जातिगत आरक्षण का नाम देकर एक दूसरे को दिग्भ्रमित करने की कोशिश करते है, जबकि जातिगत आरक्षण कोई शब्द ही नही है। तो सवाल उठता है की अगर यह जातिगत आरक्षण नहीं है तो क्या है? यह एक सामाजिक आरक्षण है ना की जातिगत आरक्षण। अब सवाल उठता है तो आखिर दोनों में अंतर क्या है। यह सच है की यह जाती आधारित आरक्षण है लेकिन संविधान क्या कहता है इसके बारे में और संविधान सामाजिक आरक्षण कहता है ना की जातिगत आरक्षण। आरक्षण का अर्थ जाति पात से नहीं बल्कि सबको उसकी मेहनत का फल मिले जिससे देश मे बेरोजगारी खत्म हो । भारत की जनसंख्या बीते एक दशक में 18.1 करोड़ बढ़कर अब 1.21 अरब हो गई है। जनगणना के ताजा आँकड़ों के मुताबिक, देश में पुरुषों की संख्या अब 62.37 करोड़ और महिलाओं की संख्या 58.64 करोड़ है। इतनी जनसंख्या हैं देश इसमे 1.37 करोड़ जनता बेरोजगार हैं। ऐसे में आरक्षण का खत्म होना बहुत जरूरी हैं।

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