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विधायक हराते-हराते, सरकार ही गवां दी

विधायक हराते-हराते, सरकार ही गवां दी      (हेमेन्द्र क्षीरसगर, पत्रकार, लेखक व विचारक)              उन्हें नजरअंदाज ना करों जो तुम्हारी बहुत परवहा करते है, वरना एक दिन पत्थर चुनते-चुनते हीरा गवा दोगें।  ये कहावत तब चरितार्थ हुई जब मध्यप्रदेश में विधान सभा चुनाव के परिणाम सामने आए। यहां विधायक हराते-हराते लोगों नेे अपनी सरकार ही गवां दी। वह सरकार हरा दी जिसे बनाये रखना चाहती थी। पर करे कोई और भरे कोई के चक्कर में अपने चेहते शिवराज सिंह चौहान को ही खो दिया। और अब पछताये क्यां जब चिडिय़ा चुक गई खेत। देना था वनवास  विधायक को और दे दिये मुख्यमंत्री को। उस मुख्यमंत्री को जिसने पैदा लेने से लेकर मरने तक योजना बनाकर सदा जन कल्याण ही किया। आखिर ! इनसे क्यां खता हुई जो सजा इनको मिली। आज भी प्रदेश की जनता यह मानने को तैयार नहीं हो रही है कि मामा हमारे मुख्यमंत्री नहीं रहे। यह इनके लिए सब्जबाग की तरह लग रहा है लेकिन सच तो सच है इसे मानना ही पड़ेगा कि शिवराज पक्ष में नहीं अपितु विपक्ष में रहकर काम ...

धर्म निरपेक्ष (सेकुलर) सरदार वल्लभ भाई पटेल को उनकी 68वीं पुण्यतिथि पर हार्दिक आदरांजलि, हार्दिक श्रृध्दांजलि।

धर्म निरपेक्ष (सेकुलर) सरदार वल्लभ भाई पटेल को उनकी 68वीं पुण्यतिथि पर हार्दिक आदरांजलि, हार्दिक श्रृध्दांजलि।     सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को हुआ था। सरदार पटेल एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आज़ाद भारत के पहले गृहमंत्री थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। 31 अक्टूबर 1875 गुजरात के नाडियाद के करमसद गांव में सरदार पटेल का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम झवेरभाई और माता का नाम लाडबा देवी था। सरदार पटेल अपने तीन भाई बहनों में सबसे छोटे और चौथे नंबर पर थे। शिक्षा :सरदार वल्लभ भाई पटेल की शिक्षा का प्रमुख स्त्रोत स्वाध्याय था। उन्होंने लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई की और उसके बाद पुन: हिंदुस्तान आकर अहमदाबाद में वकालत शुरू की। स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी : सरदार पटेल ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। सरदार पटेल द्वारा इस लड़ाई में अपना पहला योगदान खेड़ा संघर्ष में दिया गया, जब खेड़ा क्षेत्र सूखे की चपेट में था और वहां के किसानों ने अंग्रेज़ सरकार से कर में छूट देने की मांग की। ज...

राफेल और राजनीति।

राफेल और राजनीति। राफेल पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय की कुछ ख़ास बातें: 1. प्रोसेस - सरकार ने जिस प्रक्रिया का पालन किया वो उचित है, हम उससे संतुष्ट हैं। 126 की जगह 36 जेट लेने पर हम कुछ नहीं कह सकते हैं। 2. दाम - मूल्य निर्धारण हमारा काम नहीं है। 3. आफसेट पार्टनर - ये विक्रेता (वेंडर) पर निर्भर है ना की सरकार के ऊपर, इसमें इंवाल्व होना हमारा काम नहीं है। 4. व्यक्तियों की धारणा पर हम हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं, इस मामले में एक्ज़ामिनेशन सेक्शन 32 के तहत अदालत द्वारा तय क्षेत्राधिकार के बिंदु पर हुयी है।  यहां हम सब याचिकाओं को ख़ारिज करते हैं।  हे गोदी मीडिया के टेलीविज़न वीरो और अंधविश्वासी चम्चो!  माननीय उच्चतम न्यायालय ने ये नहीं कहा की सब दुरुस्त है उन्होंने कहा कि ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। इसका मतलब सीबीआई और जेपीसी जांच कर सकतीं हैं। तुम लोग ख़ुश और भाषा की मर्यादा भूलकर ऐसे हमलावर हुऐ जैसे कि किसी सामूहिक हत्या या बलात्कार का आरोपी दोषमुक्त होकर ख़ुश होता है। क्या उच्चतम न्यायलय में कांग्रेस ने राफेल मामले  को उठाया? इस ...

देश धर्म का नाता है - गाय हमारी माता है।"

" देश धर्म का नाता है - गाय हमारी माता है।"  मां तो एक ही होती है या राज्यों और वोटों के हिसाब से बदलती है? कुछ राज्यों में गौमांस पर पूर्ण प्रतिबंध का वादा कर वोट मांगे जाते हैं। कुछ राज्यों में गौमांस सस्ता और सुलभ करने के वादे के साथ वोट मांगे जाते हैं। यह वैध और अवैध स्लोटर हाउस क्या होते हैं? कट तो दोनों ही जगह गौवंश ही रहा है। बंद करो सबको। कभी देखा इन गौरक्षकों - गौ सैवकों, बड़े नेताओं और लेखकों को बड़े स्लाटर हाउस को बंद कराने और गौवंश के मांस का निर्यात बंद करने के लिये आंदोलन करते और आवाज़ उठाते हुऐ ? संसद में विरोध करते हुऐ? अब तो अतिवादी हिन्दू संगठनों के नेता और कार्यकर्ता ही गौवंश को क़साईयों के हवाले करने लेजाते हुऐ पकड़े जारहे हैं। बड़ी मज़ेदार तस्वीर है, भूखी गायें भाजपा का ही चूनावी पोस्टर खा रही हैं। आज के ही अख़बार में प्रकाशित हुई है। पूरे हिन्दुस्तान में एक वक़्त में ऐसी हज़ारो जगह मिल जायेंगी, जहां भूखी गायें काग़ज़, पन्नी, सड़े गंदे कपड़े, फल, सब्ज़ी यहां तक कि गंदगी खाती मिल जायेंगी। सब्ज़ी, फल, किराना सामान के दुकानदार भूखी गायों लोहे लगे डंडे ...

छ: दिसंबर 1992 शौर्य दिवस या काला दिन? 'बाबरी मस्जिद' उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद ज़िले के अयोध्या शहर में रामकोट पहाड़ी पर एक मस्जिद थी। रैली के आयोजकों द्वारा मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाने देने की भारत के सर्वोच्च न्यायालय से वचनबद्धता के बावजूद, 6 दिसंबर 1992 में लगभग 1,50,000 लोगों की एक प्रायोजित एवं पूर्वनियोजित हिंसक रैली ने इसे विध्वस्त कर दिया। लीजिये 26 बरस बाद आज फिर छह दिसंबर आगया। किसी के लिए शौर्य दिवस तो किसी के लिए काला दिवस बन कर। धरना प्रदर्शन होंगे, ज्ञापन दिये जायेंगे, गोष्ठियां होंगी, काली पट्टियां बांधी जायेंगी, मिठाईयां बंटेगी, जश्न मनाया जायेगा, दोषारोपण होगा। लेकिन सब होगा सांकेतिक, अपनी – 2 सियासी दुकानें चमकाने और चलाने के लिए। समस्या के समाधान के लिए कोई गंभीर नहीं। इस लिए सबसे पहले यही प्रश्न झकझोर देता है कि क्या अयोध्या सिर्फ हिन्दु भाईयों के लिये ही आस्था का केन्द्र है? मुसलमानों के लिये “हज़रत शीश पैग़म्बर की समाधि/मज़ार ” के कारण आस्था केन्द्र नहीं? अयोध्या, छ: दिसंबर १९९२ के बाद - अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी तो नहीं है? अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी तो नहीं है? सोचिये, गंभीरता से सोचिये।“ यह भी सोचिऐ कि देश संविधानुसार चलेगा या सिर्फ आस्थाओं पर चलेगा? हिन्दुस्तानियों का यक़ीन है कि अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए। बनवास भेजे गए। लौट कर आए तो वहां राज भी किया। उनकी ज़िंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया। जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है। जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं। जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है। जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है। जहां भरत रहे वहां मंदिर है। हनुमान मंदिर है। कोप भवन है। सुमित्रा मंदिर है। दशरथ भवन है। ऐसे बीसीयों मंदिर हैं और इन सबकी उम्र 400-500 साल है। यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा। अजीब है न? कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर? उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है। उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया? कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए ज़मीन दे रहे थे? शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए ज़मीन मुसलमान शासकों ने ही दी? दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज़ भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी? निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के ज़मीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी? सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद? वर्तमान हकीकत यही है कि अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं। मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं। उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर, राम पर चढ़ते रहे। मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं। ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे। सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा। 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे। जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या? अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है। उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं, किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता। सब आते हैं। एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया।“ पिछले छब्बीस वर्षों से तथाकथित रामज़ादों की करतूत के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम तम्बू में विराजमान हैं और ख़राब तम्बू को बदलने का निर्णय भी न्यायालय द्वारा लिया जा रहा है। आस्था के नाम पर देश के संविधान, न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं को नकारने वालों की आस्था अब कहाँ चली गयी है? राम जी की इस बदहाली के ज़िम्मेदार और सत्ता प्राप्त कर उनसे विश्वासघात करने वाले क्या हैं? क्या बस छह दिसंबर 1992 ही सच है, कौन जाने? छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया। वहां ताले पड़ गए। आरती बंद हो गई। लोगों का आना जाना बंद हो गया। बंद दरवाज़ों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते नहीं होंगे, कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी, जो राम के नाम पर अयोध्या, भारत, पाकिस्तान, बंगला देश आदि में बहाया गया? अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी नहीं है? अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी नहीं है? सोचिये, गंभीरता से सोचिये।“ एक आम इंसाफ और अमन पसंद हिन्दुस्तानी की हैसियत से जब इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश करता हूँ, तो और बैचैन हो जाता हूँ। कुछ और सवाल ज़ेहन में उठने लगते हैं, जैसे: 1- मुगल साम्राज्य सन् 1526 से 1857 अर्थात 331 साल का था। अर्थात बाबर सन् 1526 में भारत के बादशाह के रूप में गद्दी पर बैठा, अकबर , बाबर के पोते था जो 1556 में हिन्दुस्तान के शहंशाह बना, अर्थात बाबर के 30 साल बाद। बीच में 1540 से 1554 अर्थात 14 साल देश में शेरशाह सूरी का शासन था। ख़ैर, 1556 से अकबर के बादशाह का दौर सन् 1605 तक अर्थात 49 साल चला और इसी दौर में गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म 1511 को राजापुर चित्रकूट में हुआ और उनकी मृत्यु 1623 में वाराणसी के असीघाट पर हुई, अर्थात उनका कुल जीवन 112 वर्ष का रहा। रामचरित मानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी जब 16 साल के रहे होंगे तब बाबर गद्दी पर बैठा। हमारी जानकारी के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी ने महाराजा अकबर के काल में राम चरित्र मानस (रामायण) की रचना की। उनके इस पुनीत कार्य में बादशाह द्वारा विघ्न डाले जाने का कहीं कोई तज़किरा नहीं मिलता। आज देश में तुलसीदास जी की रामायण ही ज़्यादा लोकप्रिय है। 2- लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई। 18 वर्षीय तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को? बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे “मांग के खाइबो मसीत (मस्जिद) में सोइबो”। और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली। राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने का क्या तुलसी को ज़रा भी अफसोस न रहा होगा? गोस्वामी तुलसीदास बादशाह अकबर के समकालीन रहे और केवल एक "राम चरित मानस" ही नहीं बल्कि 23 पुस्तकें लिखीं। 1- रामचरितमानस 2- रामललानहछू 3- वैराग्य-संदीपनी 4- बरवै रामायण 5- पार्वती-मंगल 6- जानकी-मंगल 7- रामाज्ञाप्रश्न 8- दोहावली 9- कवितावली 10-:गीतावली 11- श्रीकृष्ण-गीतावली 12-विनयपत्रिका 13-सतसई 14-छंदावली रामायण 15-कुंडलिया रामायण 16- राम शलाका 17-संकट मोचन 18-करखा रामायण 19-रोला रामायण 20- झूलना 21- छप्पय रामायण 22- कवित्त रामायण 23-कलिधर्माधर्म निरुपण मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन की हर छोटी बड़ी घटना को लिपिबध्द करने वाले तुलसी दास जी ने रामायण में रामजन्म भूमि पर आक्रमण(?) की इतनी बड़ी घटना को लिपिबध्द क्यों नहीं किया? मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के बारे में कहीं एक वाक्य ना लिख सके? गुरुनानक (15 अप्रैल 1469 – 22 सितंबर 1539) सिखों के प्रथम (आदि गुरु) हैं। ये भी बाबर और हुमायूँ के दौर में मौजूद रहे और काफी ग्रन्थों की रचना की लेकिन कहीं पर भी तथाकथित मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाने का उल्लेख नहीं किया। सम्राट कृष्णदेवराय राज्यकाल 1509-1529 ई) विजयनगर साम्राज्य के सर्वाधिक कीर्तिवान राजा थे। वे स्वयं कवि और कवियों के संरक्षक थे।भारत से मुग़ल वंश को उखाड़ फेंकने में लगातार प्रयासरत रहे।स्व:रचित साहित्य में कहीं भी इस घटना का उल्लेख नहीं मिलता। महान कवि सूरदास जन्म 1478-1580ई. मीराबाई(1504-1558) कृष्ण-भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं चैतन्य महाप्रभु ( 1486-1534ई.) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। संत तुकाराम (1608-1650)भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ थे। मलिक मुहम्मद जायसी (1477-1542) हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि हैं। घनानंद (1673- 1760) रीतिकाल की तीन प्रमुख काव्यधाराओं- रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त के अंतिम काव्यधारा के अग्रणी कवि हैं। राजाराम मोहनराय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, रविन्द्र नाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चटर्जी, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, आदि असंख्य ऐसे कवि, लेखक गुज़रे हैं जिनके द्वारा रचित साहित्य में इस घटना का कोई उल्लेख नहीं मिलता 3- शाश्वत सत्य है कि सुबूत मुजरिम मिटाता है, इस विवाद के सुबूत किसने और क्यों मिटाए? 4- देश के लोकतंत्र, संविधान, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि संस्थानों के साथ विश्वास्घात किसने किया? इनकी धज्जियाँ उड़ाना "काला दिन" क्यों नहीं? 5- एक खस्ताहाल इमारत को शासन और प्रशासन के संरक्षण ज़मींदोज़ कर देना,किस प्रकार के शौर्य की श्रेणी में आता है? 6- जब एक पक्ष निरंतर अदालत का फैसला मानने की सार्वजनिक घोषणा करता चला आरहा है, और प्रारम्भ से ही अदालत के आदेश का पालन कर रहा है तो फिर भीड़ एकत्र कर दबाव की राजनीति क्यों? अदालत और शासन प्रशासन को धमकी क्यों? नफरत और झूठ का कारोबार क्यों? 7- अदालत में भी बहूमत न्यायधीश हिन्दू, दोनों पक्ष के वकील हिन्दू, अन्य स्टाफ भी हिन्दू, विधायक से लेकर राष्ट्रपति तक सब हिन्दू, संघ की ही विचार धारा की प्रदेश और देश में पूर्ण बहुमत में सरकार। फिर भी किसी पर भरोसा नहीं। हमारे धैर्य की सीमा समाप्त हो गई, संघ प्रमुख का हाल में ही दिऐ गये इस ब्यान के निहितार्थ क्या हैं? हमारी बात मानों नहीं तो हम अराजकता फैलाऐंगे। यह फासीवाद नहीं तो क्या है? 8- राममन्दिर अयोध्या में नहीं तो कहाँ बनेगा? लेकिन "लत्ते को सांप" बनाकर देश और समाज के सामने जो गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए गये हैं, दो समाजों में जो नफरत,झूठ और अविश्वास का ज़हर फैला दिया है उनके सही उत्तर तो ढूँढने ही होंगे। तभी तथाकथित रामज़ादों और (ह)रामज़ादों का सही चेहरा सामने आयेगा। “सत्य के साधक मर्यादा पुरुषोत्तम राम को दिल की गहराइयों से सलाम। (सैयद शहनशाह हैदर आब्दी) समाजवादी चिन्तक –झांसी

छ: दिसंबर 1992 शौर्य दिवस या काला दिन? 'बाबरी मस्जिद' उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद ज़िले के अयोध्या शहर में रामकोट पहाड़ी पर एक मस्जिद थी। रैली के आयोजकों द्वारा मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाने देने की भारत के सर्वोच्च न्यायालय से वचनबद्धता के बावजूद, 6 दिसंबर 1992 में लगभग 1,50,000 लोगों की एक प्रायोजित एवं पूर्वनियोजित हिंसक रैली ने इसे विध्वस्त कर दिया। लीजिये 26 बरस बाद आज फिर छह दिसंबर आगया। किसी के लिए शौर्य दिवस तो किसी के लिए काला दिवस बन कर। धरना प्रदर्शन होंगे, ज्ञापन दिये जायेंगे, गोष्ठियां होंगी, काली पट्टियां बांधी जायेंगी,  मिठाईयां बंटेगी, जश्न मनाया जायेगा, दोषारोपण होगा। लेकिन सब होगा सांकेतिक, अपनी – 2 सियासी दुकानें चमकाने और चलाने के लिए। समस्या के समाधान के लिए कोई गंभीर नहीं। इस लिए सबसे पहले यही प्रश्न झकझोर देता है कि क्या अयोध्या सिर्फ हिन्दु भाईयों के लिये ही आस्था का केन्द्र है? मुसलमानों के लिये “हज़रत शीश पैग़म्बर की समाधि/मज़ार ” के कारण आस्था केन्द्र नहीं? अयोध्या, छ: दिसंबर १९९२ के बाद - अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी तो ...

‘दुनियां के मज़दूरों एक हो’, मगर कैसे?

‘दुनियां के मज़दूरों एक हो’, मगर कैसे?  मेहनतकशों के आंदोलन का एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय नारा है- ‘दुनियां के मज़दूरो एक हो’। हमारा भी मानना है कि जब तक वे एक नहीं होंगे, तब तक मानव मुक्ति संभव नहीं। इसलिए संघर्ष के हर रण क्षेत्र में यह नारा जोश भरे स्वर में लगाया जाता है। आदतन हम इस नारे को, जो बदली हुई सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, परिस्थितियों में पूरे जोशो ख़रोश से लगाते रहते हैं। लेकिन इस सवाल से कभी जूझने या उसके रूबरू खड़े होने की कोशिश नहीं करते कि दुनियां के मज़दूर एक कैसे हो सकते हैं? कुछ नारे और हैं,"हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है।", "चाहे जो मजबूरी हों - हमारी मांगें पूरी हों।" मगर कैसे? यही वजह है कि दिनों दिन व्यावहारिक दृष्टि से यह नारे अपनी अर्थवत्ता खोते जा रहे हैं। जब मज़दूर संगठन के अंदर ही  आंतरिक गुटबाज़ी, परिवारवाद, जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के आधार पर मात्र दो अंकों की कार्यकारिणी सदस्यों की संख्या में विभाजन कर संगठन पर क़ब्ज़ा करने की कोशिशें, 'हम कुछ जानते नहीं, दूसरा कहे उसे मानते नहीं।' जैसी अज्ञानता, बुज़ुर्ग...

आईये आज संविधान दिवस पर देखें, क्या कहती है “भारत के संविधान” की ‘उद्देशिका’ :

डा0 भीम राव अम्बेडकर जी के मार्गदर्शन में निर्मित संविधान की 68वीं वर्ष गांठ: संविधान दिवस 26 नवम्बर 2018। आईये आज संविधान दिवस पर देखें, क्या कहती है “भारत के संविधान” की ‘उद्देशिका’ :  “हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व–सम्पन्न "समाजवादी" "पंथनिरपेक्ष" "लोकतंत्रात्मक गणराज्य" बनाने के लिये तथा उसके समस्त नागरिकों को समाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिये तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिये दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। ”   अब माननीय मोदी जी के अंधभक्तों, संघियों,ई-संघियों, मु-संघियों, छ्दम राष्ट्रवादियों और उनकी वबाली मंडली से अनुरोध है कि आंख, नाक, कान, दिल और दिमाग खोल कर बहुत ध्यान से संविधान की उपरोक्त उद्देशिका को पढ़ें और मनन करें कि "पंथ निरपेक्ष...

‘मुहम्मद’ का अर्थ होता है‘ जिस की सबसे ज़्यादा तारीफ की गई हो।’

इस्लाम के पैगम्बर रसूले ख़ुदा हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वाआलेही वसल्लम) का यौमे पैदाइश – जश्ने ईदे मीलादुन्नबी आलमे इन्सानियत को बहुत बहुत मुबारक !         – सैयद शहनशाह हैदर आबदी इतिहासकारों के अनुसार  मुहम्मद  (सल्ल.) का जन्म अरब के रेगिस्तान में 20 अप्रैल571 ई. में हुआ। ‘मुहम्मद’ का अर्थ होता है‘ जिस की सबसे ज़्यादा तारीफ की गई हो।’ हमारी नज़र में आप अरब के सपूतों में सबसे ज़्यादा जानने वाले और सबसे उच्च बुद्धि के व्यक्ति हैं। आपसे पहले और आप के बाद, इस लाल रेतीले रेगिस्तान में जन्मे सभी कवियों और शासकों की अपेक्षा आप का प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। जब आप पैदा हुये अरब उपमहाद्वीप केवल एक सूना रेगिस्तान था। मुहम्मद (सल्ल.) की सशक्त आत्मा ने इस सूने रेगिस्तान से एक नए संसार का निर्माण किया, एक नए जीवन का, एक नई संस्कृति और नई सभ्यता का। आपके द्वारा एक ऐसे नये राज्य की स्थापना हुई, जो मराकश से ले कर इंडीज तक फैला और जिसने तीन महाद्वीपों- एशिया, अफरीक़ा, और यूरोप के विचार और जीवन पर अपना अभूतपूर्व प्रभाव डाला। इस्लाम धर्म ऐतिहासिक है और उसके पैगम...

शेरे मैसूर मर्दे मुजाहिद - टीपू सुल्तान।

शेरे मैसूर मर्दे मुजाहिद - टीपू सुल्तान। टीपू सुल्तान की पैदाइश 20 नवम्बर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली (यूसुफ़ाबाद) (बंगलौर से लगभग 33 (21 मील) किमी उत्तर मे) हुआ था। उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था। उनके वालिद का नाम हैदर अली और वालिदा का नाम फ़क़रुन्निसा था। उनके वालिद हैदर अली मैसूर हुकूमत के सिपहसालार थे जो अपनी ताक़त से 1761 में मैसूर साम्राज्य के बादशाह बने। टीपू को मैसूर के शेर के रूप में जाना जाता है। योग्य शासक के अलावा टीपू एक विद्वान, कुशल़ और योग्य सेनापति और शायर भी थे। 18 वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में हैदर अली का इंतक़ाल पुरमलाल एवं टीपू सुल्तान का राज्यरोहन मैसूर कि एक प्रमुख घटना है । टीपू सुल्तान के आगमन के साथ ही अंग्रेज़ों कि साम्राज्यवादी नीति पर ज़बरदस्त आधात पहुँचा जहाँ एक ओर कम्पनी सरकार अपने नवजात ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए प्रयत्नशील थी तो दूसरी ओर टीपू अपनी वीरता एवं कुटनीतिज्ञता के बल पर मैसूर कि सुरक्षा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा किये हुऐ थे। वस्तुत:18 वी शताब्दी के उत्तरार्ध में टीपू एक ऐसे महान शासक थे जिन्होंने अंग्रेज़ों को हिन्दुस्त...

रानी लक्ष्मीबाई और इंदिरा गांधी !

रानी लक्ष्मीबाई और इंदिरा गांधी ! भारत की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका – रानी लक्ष्मीबाई और भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दोनों ही बहादुर धर्म निरपेक्ष महिलाओं  के जन्म दिवस पर कृतज्ञ राष्ट्र की श्रृध्दांजलि। देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बहादुर धर्म निरपेक्ष रानी लक्ष्मीबाई के अप्रतिम शौर्य से चकित अंग्रेजों ने भी उनकी प्रशंसा की। लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ ने टिप्पणी की कि रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक ख़तरनाक भी थी। आज वह अपनी वीरता के किस्सों को लेकर किंवदंती बन चुकी हैं। वर्तमान में आपसी अविश्वास और दोषारोपण, न केवल देश में कई समस्याऐं खड़े कर रहा है, बल्कि देश और समाज को कमज़ोर भी कर रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और शौर्य की बेमिसाल कहानी -साम्प्रदायिक सौहार्द और आपसी विश्वास की दास्तान भी है। वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम रानी झांसी, ख़ुदा बख़्श और ग़ुलाम ग़ौस खां के आपसी विश्वास और भाई चारे से शिक्...

नेहरू, पटेल और गांधी ! एक दूसरे के पूरक!! नेहरु जयंती पर विशेष लेख।

नेहरू, पटेल और गांधी  ! एक दूसरे के पूरक!! नेहरु जयंती पर विशेष लेख। देश 14 नवम्बर 2018 को चाचा नेहरू की 129 वीं ज्यंती मनायेगा। लेकिन अफसोस एक ख़ास विचारधारा से पोषित लोग नेहरु के विशाल व्यक्तित्व, उनकी उपलब्धियों, देश और समाज के प्रति उनकी सेवाओं को नकारने पर आमादा हैं। बल्कि उनका चरित्रहनन कर उनके और उनके परिवार के मज़हब पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। क्या यही भारतीय संस्कृति है? इन तीनों महान हस्तियों को एक-दूसरे के ख़िलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रहे लोगों को एक बार साबरमती आश्रम और सरदार पटेल राष्ट्रीय स्मारक अहमदाबाद ज़रुर जाना चाहिए। हर चीज़ को विवादित करने के आदी ये चंद लोग शायद अपनी घिनौनी साज़िशों और संकीर्ण मानसिकता से बाहर आ सकें? हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें इन पवित्र स्थलों के दर्शन का सुअवसर मिला। अवकाश का भरपूर लाभ उठाया और गहन अध्ययन में पूरा दिन बिताया। यहां पुष्टि हुई कि नेहरू जी सरदार पटेल से उम्र में 14 साल छोटे थे। वे महात्मा गांधी के सबसे घनिष्ठतम और निकटतम साथी थे। कड़ा बोलते थे, खरा बोलते थे और एकदम सीधा बोलते थे। कोई लाग लपेट नहीं थी। कई बार महात्मा गांधी...

तानाशाही, झूठ, पाखण्ड, बगुलाभगती और अहंकार पर जनतंत्र, सत्य, ईमानदारी और विनम्रता की जीत का जश्न है – विजयदशमी !

दिनांक : १९.१०.२०१८. शुक्रवार विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनायें !!  तानाशाही, झूठ, पाखण्ड, बगुलाभगती और अहंकार पर जनतंत्र, सत्य, ईमानदारी और विनम्रता की जीत का जश्न है – विजयदशमी ! आज विजयादशमी पर्व है। विजयादशमी पर्व प्रतीक है,असत्य पर सत्य , आडम्बर पर सादगी का, अराजकता पर सदाचरण का, अन्धकार पर उजाले की विजय का और महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ मान सम्मान की रक्षा का। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस मे लिखा है :- "रावन रथी, विरथ रघुवीरा " यहाँ रावण प्रतीक है आडम्बर का, अहंकार का, विलासिता का, दंभ का, अत्यंत सुविधा भोगी भौतिकवादी परिवेश का, अपनी बौद्धिक क्षमता के अनाधिकृत और अप्रासंगिक दोहन का, समष्टि मे थोपी गयी व्यष्टि वादिता का, मानवीय संवेदन की अन्यमनस्कता का, महिला पर अत्याचार और उनके अपमान का। इसीलिए रावण रूपी कुरूपता का दहनकर, अपने अन्तस मे राम का मूलत्व को अंगीकार करना होगा, तभी हम त्याग, सर्मपण, बलिदान,  करूणा, आदि संवेदन प्रसारित और परिभाषित करते हुए, विजयादशमी का मूल अंकुरित करने मे सफल होंगे। विजयदशमी के शुभ अवसर पर सच्ची श्रृध्दान्जली यही होगी कि हम...

भूख एक लाइलाज बीमारी

भूख एक लाइलाज बीमारी    (हेमेन्द्र क्षीरसागर लेखक,पत्रकार व विचारक) विचारणीय कोई खां-खां के मरता है तो भूख रहकर यह दंतकथा प्रचलित होने के साथ फलीभूत भी है। ये दोनों ही हालात में भूख को लाइलाज बीमारी बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड रहे है। लिहाजा, भूख और कुपोषण एक सिक्के के दो पहलु हैं जहां तक कुपोषण की बात करे तो कुपोषण एक बुरा पोषण होता हैं। इसका संबंध आवश्यकता से अधिक हो या कम किवां अनुचित प्रकार का भोजन, जिसका शरीर पर कुप्रभाव पडता हैं। वहीं बच्चों में कुपोषण के बहुत सारे लक्षण होते है, जिनमें से अधिकांश गरीबी, भूखमरी और कमजोर पोषण से संबंधित हैं। ऐसे बच्चे अपनी पढाई निरंतर जारी नहीं रख पाते और गरीबी के दोषपूर्ण चक्र में फंस जाते हेैं। कुपोषण का प्रभाव प्रौढावस्था तक अपनी जडें जमाए रखता हैं। प्राय: देखा गया है कि भारत में कुपोषण लडकों की अपेक्षा लडकियों में अधिक पाया जाता हैं। और अनिवार्यत: इसका कारण है घर पर लडकियों के साथ किया जाने वाला भेदभाव या पक्षपात। निर्धन परिवारों में और कुछ अन्य जातियों में लडकियों का विवाह छोटी आयु में ही कर दिया जाता है...

पूर्व राष्ट्रपति मरहूम अब्दुल फाकिर ज़ैनुलआब्दीन कलाम की 87 वीं जयंती पर उनके प्रेरणादायक विचार:

जन्मदिन पर विशेष: पूर्व राष्ट्रपति मरहूम अब्दुल फाकिर ज़ैनुलआब्दीन कलाम की 87 वीं जयंती पर उनके प्रेरणादायक विचार:  मिसाइलमैन के नाम से जाने -जाने वाले एपीजे अब्दुल कलाम की आज 87 वीं जयंती है। वे भारत के 11वें राष्ट्रपति थे। उन्हें साल 2002 में भारत का राष्ट्रपति बनाया गया था। वहीं, पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद वे वापस शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक सेवा में लौट आए थे। पूर्व राष्ट्रपति कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से की थी। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का 27 जुलाई, 2015 को वे आईआई एम शिलॉन्ग में लेक्चर देने गए थे, इसी दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था। यहां पढ़ें उनके कुछ प्रेरणादायक विचार: आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत, असफलता नामक बीमारी को मारने के लिए सबसे बढ़िया दवाई है। जीवन में फेल होते हैं तो कभी हार न मानें क्योंकि फेल (FAIL) मतलब फर्स्ट अटैम्प्ट इन लर्निंग होता है। अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हैं तो पहले आपको सूरज की तरह तपना होगा। इंतज़ार करने वालों को सिर्फ उत...

सबका साथ - सबका विकास ?

सबका साथ - सबका विकास ?  अर्थात 125 करोड़ हिन्दुस्तानी को विकास के समान अवसर? एक तरफ गुजरात सरकार सभी गुजराती प्राइवेट कंपनियों के लिए नियम ला रही है कि किसी भी उद्योग या कंपनी में कम से कम 75 प्रतिशत गुजराती लोगों को ही नौकरी पर रखे । दूसरी ओर उत्तर भारतीयों पर हमले हो रहे है, उन्हें भगाया जा रहा है। कहीं दोनों बातों में आपस में कोई सम्बन्ध तो नहीं? यह सीन मुहम्मद ग़ज़नी के आक्रमण के ख़ौफ से भागते हुये लोगों का नही है। न ही बाबर ने राणा साँगा के विरुद्ध जंग का ऐलान किया है और राणा की फौज पीछे हट रही है। यह दृश्य है आज़ाद भारत के 72 सालों बाद देश के सबसे विकसित (?) प्रदेश गुजरात का। जहाँ से बिहार, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के हिन्दी भाषी मेहनतकश ज़बरदस्ती हिंसा करके भगाये जा रहे हैं। छद्म हिन्दू राष्ट्रवाद के तले अपने ही देश के भीतर एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेशों के लोगों को खदेड़ रहे हैं। यह मोदी / शाह / रूपानी / संघी / बजरंगियों के उस गिरोह की कारस्तानी है जिन्होंने पिछले 4 सालों में मुल्क को जहन्नुम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मगर कांग्रेस भी कम दोषी नहीं, इसी कांग्...

दिल नहीं दिमाग से हो मतदान

दिल नहीं दिमाग से हो मतदान  ( हेमेन्द्र क्षीरसागर, लेखक, पत्रकार व विचारक ) भा रत दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश है, देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को विश्व में बडे सम्मान, स्वंछच्दता के साथ देखा जाता हैं। इस महान लोकतांत्रिक पंरपरा के महायज्ञ का आगाज चुनाव आयोग ने कर दिया। दौर में पांच राज्यों में सम्पन्न होना हैं, जिसमें सभी मतदाताओं को अपनी मतदान रूपी आहुती देना है। पुण्य स्वरूप हमारा लोकतंत्र और अधिक मजबूत, सर्वस्पर्शी बनेगा। मतदान से ही अपने जनप्रतिनिधी को चुनेगें, वह जनप्रतिनिधी प्रदेशों की नई सरकारों का गठन करेगें। नई सरकारों से हमारी बहुत सारी आशाऐं, अपेक्षाऐं, जरूरतें जुडी हुई हैं। यह सरकारें प्रदेश के विकास, जनकल्याण और देश की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। आखिर यह सब संभव होगा हमारे मतदान से यह मत रूपी दान, दिल की आवाज सुनकर, भावनाओं में बहकर नहीं वरन् अपने दिल की विवेकशिलता से करना होगा। तात्पर्य यह कि प्रत्याशियों के गुणों अथवा अवगुणों का मुल्यांकन योग्यता, निष्ठा और सुलभता के भाव से करना होगा। भय, पछपात, घृणा से नहीं, तभी एक अच्छे, स्वच्छ, कर्मठ जनप्रतिनिधी...

एकात्म मानववाद के प्रेणता महामना दीनदयाल

 एकात्म मानववाद के प्रेणता महामना दीनदयाल ( हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक )       यु ग दृष्टा, कर्मयोगी और सामाजिक चिंतक पं. दीनदयाल उपाध्याय का जीवन दर्शन हम सबके के लिए प्रेरणादायी हैं। वह कपटरहित, निष्ठावान व्यक्तित्व और राष्ट्रीय कृतित्व से अभिभूत भारत माता के सच्चे पुजारी थे। उनके बुद्धि कौशल व राजनैतिक चातुर्य और निस्वार्थ देशप्रेम के भाव से ही वे गंगा समान पवित्र हृदय, शांत, शालीन व कई बार गहरे जल सदृश्य खामोश नजर आते थें। सादगी पंडित जी का एक महत्वापूर्ण जीवन-मूल्य था। सादा रहन-सहन और उच्च-विचार महान पुरूषों का एक लक्षण माना गया हैं। वही भाव दीनदयाल जी के रहन-सहन-पोशाक और बहुत ही सादगी भरे मर्मस्पर्शी जीवन में समाहित था। उल्लेखनीय बात यह है कि सब वे अकृत्रिमता से करते थे।     यथार्थ, दीनदयाल दर्शन कागज का टुकडा नहीं हैं, जो जर-जर हो सके। अभिष्ट ही राष्ट्रपिता की स्वदेशी से ग्रामोदय और दीनबंधु दीनदयाल के अन्त्योदय से सर्वोदय की परिकल्पना भारतीय जीवन का मूलाधार है। अभिभूत, एक चिंतक, प्रखर साहित्यकार और श्रे...

मुहर्रम (ग़मगीन पर्व) पर विशेष।

मुहर्रम (ग़मगीन पर्व) पर विशेष। इस्लामी नया साल "हिजरी" क्यों कहलाता है? इस्लामी नए साल की मुबारकबाद का औचित्य? हमारे नबी रसूले ख़ुदा मोहम्मद मुस्तफा सल्लाहोअलैहेवसल्लम, चारों खुलाफा ए राशेदीन, सभी इमामों और हमारे बुज़ुर्गों और किसी राजनेता, शासनाध्यक्ष आदि ने आज तक इस्लामी नए साल की मुबारकबाद क्यों नहीं दी? कभी सोचिये? दरअसल इस्लामी नया साल रसूले खुदा की 'हिजरत' से शुरू होता है। यानी हमारे नबी सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम को इतना परेशान किया गया कि वो अपना घर बार और शहर छोड़कर दूसरे शहर हिजरत करने पर मजबूर हो गए। और उन्होंने मक्का शहर से मदीना शहर में हिज़रत की थी।  इस तरह 'हिजरत' से 'हिजरी' बना और इस्लामी नए साल 'हिजरी' की शुरूआत हुई। अब आप बताएं क़ि रसूले ख़ुदा का परेशान होकर घर बार छोड़ना मुबारक बाद का मौक़ा कब से होगया ? उसके बाद सन् 61 हिजरी में रसूले खुदा के प्यारे नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में दर्दनाक शहादत ने मोहर्रम को और ग़मगीन बना दिया। भाई, दूसरों के नए साल खुशीयों और हर्षोउल्लास के साथ शुरू होते हैं । जबकि इस्...