आईपीएस अधिकारी ने अपने पद का किया दुरुपयोग बेगुनाह को डाला जेल में।
रिपोर्ट - रूपेश श्रीवास्तव
लखनऊ पुलिस का इतिहास कई रोमांचक किस्सों और जांबाजी से भरा हुआ है। यहां के अनेक पुलिस अफसर अपने काम से सुर्खियों में रहे और नागरिकों का विश्वास जीता। इस कॉलम में हम आपको ऐसे ही कुछ अलग करने वाले वर्दी वालों से परिचित कराते हैं। इनमें IPS जकी अहमद की अलग पहचान है। राजधानी में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर तैनात रहे जकी अहमद को कड़क मिजाज और इंसाफ पसंद अफसर के रूप में याद किया जाता है। 1993 बैच के आईपीएस अफसर जकी अहमद मूल रूप से मऊ के रहने वाले है | वर्तमान में जकी अहमद ADG ( ATC ) है |
वर्ष 2015 में लखनऊ जोन के पुलिस महानिरीक्षक बने जकी अहमद ने संगीन वारदात की तफ्तीश पर नजर रखने के साथ पकड़े गए आरोपियों से खुद पूछताछ करके फर्जी गुडवर्क के खेल पर अंकुश लगाया था। सीबीआई में तैनात रहे जकी अहमद की पड़ताल का भी अलग अंदाज था। राजधानी के चर्चित गौरी हत्याकांड में पुलिस ने हिमांशु प्रजापति और उसके दोस्त अनुज गौतम को गिरफ्तार करके सनसनीखेज वारदात का खुलासा किया। जकी अहमद ने खुद पूछताछ की। पता चला कि हिमांशु प्रजापति ने अपनी दोस्त गौरी की हत्या करके उसके शव के टुकड़े किए और उन्हें ठिकाने लगाया।
एक व्यक्ति द्वारा वारदात अंजाम दिए जाने पर सवाल उठने की संभावना के चलते पुलिस ने हिमांशु के साथ उसके बेगुनाह दोस्त अनुज को भी पकड़ लिया था। लेकिन जकी अहमद ने फर्जीवाड़े पर नाराजगी जताई, लेकिन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने दोनों को जेल भिजवा दिया। इसके बाद जकी अहमद ने इस मामले की तफ्तीश की । जिसका नतीजा यह रहा कि गहन समीक्षा के बाद उसे जेल से रिहा करा दिया गया । इसी तरह अनेक लोगों को फर्जी मामले में जेल जाने से बचाने के साथ अपराधियों पर सख्त कार्रवाई कराई।
लखनऊ जोन के पुलिस महानिरीक्षक बनने से चार साल पहले लंदन पुलिस की कार्यप्रणाली का जायजा लेकर लौटे जकी अहमद ने पूरे शहर को सीसीटीवी कैमरों से कवर कराने की पहल की। अपराध नियंत्रण के लिए सीसीटीवी कैमरे और हाईटेक सर्विलांस सिस्टम पर जोर देने के साथ नागरिकों को सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए प्रेरित किया।
जकी अहमद ने राजधानी को चार क्षेत्र में विभाजित करके साप्ताहिक समीक्षा शुरू की। अपर पुलिस अधीक्षक, क्षेत्राधिकारी और थानेदारों को तलब करके प्रमुख वारदातों की तफ्तीश का ब्योरा जांचते थे। क्राइम ब्रांच को भी हर हफ्ते कसते थे। वारदातों के खुलासे के साथ अपराधियों की धरपकड़ का सिलसिला शुरू हुआ तो उन्होंने मुकदमों की पैरवी के लिए कसना शुरू किया।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें