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मीडिया की पहली शुरुआत ।

अंकिता पाल  पत्रकारिता जनसंचार विभाग (कानपुर विश्वविद्यालय)


मीडिया की पहली शुरुआत ।


 कानपुर                            



  रेडियो डॉक्यूमेंट्री रेडियो एक ऐसा माद्यम है जो वाइल्ड कार्ड से आया जिसमे न जाने कितने कार्यक्रम जिसमें हवा महल चुटकुले अन्य कार्यकम आते है टेलीविजन क़े आने के कारण लोगो ने रेडियो सुनना बन्द कर दिया और रेडियो की महत्वता कम होने लगी फिर रेडियो वाइल्ड कार्ड से एन्ट्री की और युवाओ के दिलो मे अपनी जगह बना और बुजुर्गों क़े दिलो अपनी इज़्ज़त बच्चों के मनोरंजन व कार्यक्रम व टेलिफोनिक प्रोग्राम रखे जिसमें बच्चों युवाओ बड़ो ने चढ़ बड़ कर हिस्सा लिया और तो और रेडियो ने बोल चल की भाषा का प्रयोग किया चाहें   शहरी ग्रामिड झेत्रीय भारतीय भाषाओ  का प्रयोग किया।                    
मैं अगर मोबाइल की बात करूं तो मोबाइल फ़ोन युवाओ का एक क्रेज है जो बैंड पर आधारित है वैसे ही हमारे टेलीविजन के बैंड होते है हाई लौ मीडियम बैंड अगर आपके घर मे पुराना रेडियो हो तो उसमें एम'डब्लू यानी मीडियम वेव एस डब्लू सॉर्ट वेव रेडियो मे     दो छेद होते है जिसका एक छेद मे एंटीना और दूसरा होल अर्थ के लिए होता है अब यह सब सिमट कर एक छोटे रूप मे परिवर्तित हो गया है ।
 
        
   आल इंडिया रेडियो देश का 99 फीसदी सबसे बडी संस्था जिनमे 149 मीडियम वेव 54 सॉर्ट वेव 177 एफ एम ट्रांसमीटर है यह सबसे बड़ी संस्था है 1957 से आकाशवाणी मे समाचार बुलेटिन का प्रसारण सुनने लगे      647 हिंदी अंग्रेजी नही बल्कि सभी भाषाओं का एक मिश्रण है और कुछ समय पश्चात रेडियो कहि गुम हो गया रेडियो में कृषि के कार्यक्रम आते थे कुछ समय बाद वो दिखाई देने लगे टेलीविजन की सहायता से लोग अपने काम करने लगे  तबभी रेडियो मे सुधार किए गए और रेडियो वापस आ गया लोग कही भी जा रहे हो रेडियो सुन सकते है वक्त बेवक्त कही कोई घटना हो जाये और हम सफर करने को निकले हो तो हम अपना रुट चेंज कर सकते हैं  रेडियो मे 2 चैनल आते थे एफ एम गोल्ड रेनबो और साथ ही कई प्राइवेट एफएम खुल गए जिसमें टेलीफोनिक कन्वर्सेशन होने लगी हर यूथ की आवाज एफएम में आने लगी लोगों की समस्याओं को टेलीफोनिक के माध्यम से सुनकर हल किया जाने लगा मनचाहे गाने बजने लगे और जो कमी थी टेलीफोन से सुन कर दूर किया जाने लगा भारत युवा पर एफएम ने वो बैरियर तोड़ा है जिसमें एफएम एन आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग होने लगा एफएम की एक  प्रसिदध है वो है भाषा का बार्रेयर तोड़ा जिसमें युवा पीढ़ी एफएम की ओर आकर्षित हुए पहले रेडियो में टेलीफोनिक प्रोग्राम नहीं हुआ करते है जिससे रेडियो की कमियों को नहीं सुना जा सका न ही अनुकूल समय पता था किस समय लोग जायद रेडियो सुनते थे फिर रेडियो ने फीडबैक मगा और युवाओं के मनचाहे गाने बजने लगे युवाओं से ऐसे बात की जाने लगी जैसे उनके मित्र हो फिर रेडियो में काफी सवाल उठने लगे और भाषा की आधुनिकता के साथ खिलवाड़ कहा गया और कहा गया कि पुराने आर जे शब्दों का प्रयोग बड़ी सावधानीपूर्वक करते थे ऐसा लगता था कि मानो कोई ऐसा व्यक्ति बोल रहा जो काफी लिखा पड़ा समझदार है बल्कि ऐसा शब्दों का खेल खेला जाता था कि लोग रेडियो की महत्व डे परन्तु लोग धीरे धीरे रेडियो से दूर भागने लगे लोगो को पुनः वापस लाना बड़ा मुश्किल होता है परन्तु नमुकिन्न नहीं मुसिक का सहारा लिया गया और अंगेजी तो अंग्रेजी हिन्दी तो कोई भी हो एक ही भाषा का प्रयोग किया जाता था परन्तु अब हिंदी अंग्रेजी फारसी उर्दू मिक्स कर के नई भाषा का रूप दिया था लेकिन तर्क कुछ भाषा का रूप से दिया गया लेकिन तर्क कुछ भी हो परन्तु जो वक्त के साथ बदलता है वहीं सफल कहलाता है और रेडियो ने लोगो को अपने होने का एहसास के साथ बना रहता है  अब तो मीडियम वेब 15-20 किलो मीटर के दायरे में कार्य करता है जैसे युनिवर्सटी कानपुर ब्लॉग के रूप में कार्य करता है गांव में भी लोकल में होने वाली समस्याओं को सुन कर दूर किया जाने लगा और आम आदमी को उसका हक मिलने लगा 15-20 किलोमीटर  के दायरे में रहता है।   इस बात में एफएम रेडियो ने मीडिया की नई तस्वीर दी जिससे जानकारी का विस्तार हुआ और लोगो के टैलेंट को बाहर लाने में सहायता मिली रेडियो कमेंट्री का कॉन्सेप्ट भी खुल कर आया कोई भी विषय हो राडियो आज भी नंबर 1 पर है वैसे भी रेडियो का कॉन्सेप्ट है -
by the people of the people for the people.                    

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